बरसों की यादें ...
और कही अनकही बातें /// 
वो यार मेरे जिनके साथ वक़्त-बेवक्त घुमा करता था ...
और उन्ही यारों की परछाई खुद में ढूंडा करता था ///

एक इन्तेहां का दौर ...
समझ न थी जाऊ किस और ///
खुद को जब कभी में दोष दिया करता था ...
उन हाथों का सहारा ही मुझे साहस दिया करता था ...

तुमने ही सिखाया हौसला रखना ...
और इन पहाड़ो का सफ़र हस के तय करना ///
घर जब कभी में देर से आया करता था ...
देर रात को माँ-पापा को जगाया करता था ///

लम्हे ...घर...वो यार मेरे...
हर वक़्त में चले जो साथ  मेरे ///
दिन एक ही बचा हे उन्हें समेटने का ...
उन यादों में खुद को एक बार और जी लेने का ///

भाग दौड़ में एक पल भी न रुक सका ...
और जल्दबाजी में कुछ दोस्तों से भी न मिल सका ///
पर उम्र भर यही हु में ..
हमेशा ...हर पल ...

~ जयेश ~